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शराब और शबाब .. कविता: जी आर कवियूर

मैखाने में मिले तो आप से तुम पे उतरे जामसे जाम मिले तो तुम से तू में उतरे पूरी हुवी जब पेखानेसे निकले तो फिर आपे उतरे क्या समझ में आया ये है शराब कली खिली महकी मनमोह उठी चन्द वक्त गुजारी तो मुर्जा गई और बू उठी यह है शबाब समझ ये जनाब

सात फेरे वाली कहानी कविता : जी आर कवियूर

शादी बरबादी दर आधी दे आदी पाव भारी आबादी निन्द आधी कर वानी हे और शादी कर से भारी यह हे संगट वाली न करियो तो जिन्दगी अदुरी